NATO — क्या है और क्यों यह खबरों में रहता है
NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) एक सैन्य-सहयोगी संगठन है जिसकी स्थापना 1949 में हुई थी। इसका मूल उद्देश्य सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है — यानी किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। आज NATO अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा चर्चा का सबसे असरदार नामों में से एक है।
NATO कैसे काम करता है और इसके प्रमुख पहलू
NATO का सबसे जाना-माना सिद्धांत Article 5 है, जो सामूहिक रक्षा का आधार है। संगठन में सैन्य योजना, साझा मिशन, और इंटेलिजेंस-शेयरिंग जैसी गतिविधियाँ होती हैं। हाल के वर्षों में NATO ने पारंपरिक सैन्य भूमिका के साथ साइबर सुरक्षा, हाइब्रिड खतरे और ऊर्जा सुरक्षा पर भी ध्यान बढ़ाया है।
NATO में सदस्य देशों की संख्या 30 से अधिक है और समय-समय पर विस्तार, सुरक्षा साझेदारियों और प्रशिक्षण अभियानों के जरिए यह अपना असर बढ़ाता रहता है। रूस-युक्रेन तनाव, मध्य-पूर्व की चुनौतियाँ और साइबर-हमलों जैसी घटनाओं ने NATO की भूमिका को और भी प्रमुख बना दिया है।
यह क्यों आपके लिए मायने रखता है?
शायद आप सोच रहे होंगे — NATO और मेरे रोज़मर्रा का क्या रिश्ता? NATO की नीतियाँ वैश्विक राजनीतिक परिवेश को सीधे प्रभावित करती हैं। ऊर्जा कीमतें, रक्षा उपकरणों की बिक्री, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीतिक गठबंधन इसी से प्रभावित होते हैं। उदाहरण के तौर पर रूस और पश्चिम के बीच तनाव से यूरोपीय ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक मार्केट में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसका असर भारत जैसे देशों पर भी महसूस होता है।
इसके अलावा NATO के कदमों से युद्धविराम, शांति मिशन और मानवीय राहत कार्यों पर असर पड़ता है। इसलिए बिजनेस, विदेश नीति, रक्षा और सामान्य नागरिक दोनों के लिए NATO की खबरें जानना जरूरी हो सकता है।
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Russia-Ukraine संकट में NATO की भूमिका और उसकी चुनौतियाँ
लेख रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष में NATO की भूमिका की चर्चा करता है। यह NATO की पूर्वी यूरोप में सैन्य उपस्थिति, रूस की आक्रामकता को रोकने के प्रयासों और हाल ही में विलनियस में हुए NATO शिखर सम्मेलन के बारे में जानकारी प्रदान करता है। लेख के अंत में NATO द्वारा यूक्रेन को समर्थन प्रदान करने और रूस की आक्रामकता को रोकने के लिए प्रतिबद्धता का जिक्र है।