अहोई अष्टमी 2024: गणेश जी की खीर वाली कथा के बिना व्रत अधूरा

अहोई अष्टमी 2024: गणेश जी की खीर वाली कथा के बिना व्रत अधूरा
  • Nikhil Sonar
  • 11 अक्तू॰ 2025
  • 15 टिप्पणि

जब लवीनाशर्मा, पत्रकार Times Now Hindi ने 24 अक्टूबर 2024 को प्रकाशित रिपोर्ट में बताया कि इस साल अहोई अष्टमी अहोई अष्टमी 2024भारत गुरुवार को मनाई जाएगी, तो यह खबर न सिर्फ धार्मिक माहौल को जमाएगी बल्कि लाखों माताओं के जीवन में बदलाव का संकेत भी देगी। कई प्रमुख समाचार पोर्टल – Jagran, Navbharat Times और Prabhat Khabar – ने उसी दिन की तिथियों और विधियों को पुष्टि की है। यही कारण है कि यह अवकाश सिर्फ एक पंचांगीय तिथि नहीं, बल्कि हर भारतीय परिवार की भावनात्मक जुड़ाव की रीढ़ बनना चाहता है।

अहोई अष्टमी 2024 का सांस्कृतिक महत्व

अहोई अष्टमी, जिसे अक्सर "संतान रक्षा का पर्व" कहा जाता है, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष में आती है। इस दिन विवाहित महिलाएं अहोई माता की आराधना करती हैं और अपने बच्चों के दीर्घायु और सुरक्षा के लिए निरजला व्रत रखती हैं। Jagran के धर्म डेस्क के अनुसार, व्रत की समाप्ति सूर्यास्त के बाद, तारों को अर्घ्य अर्पित करके होती है। यह अर्घ्य अर्पण सिर्फ आध्यात्मिक निहितार्थ नहीं रखता, बल्कि पारिवारिक एकता के प्रतीक के रूप में भी माना जाता है।

गणेशजी की खीर वाली कथा – क्यों है अनिवार्य?

सबसे रोचक हिस्सा वह कथा है जो गणेश जी से जुड़ी है, जिसे "गणेशजी की खीर वाली कहानी" कहा जाता है। इस कथा के अनुसार, एक दिन गणेश जी चुटकी में चावल और एक चम्मच दूध लेकर घूम रहे थे और किसी को अपनी खीर बनाने को कहा। सभी ने मना कर दिया, तभी एक वृद्धा ने मदद करने का प्रस्ताव रखा। वृद्धा ने टोप लेकर आया, जिसमें गणेश जी ने दूध डालते ही टोप पूरी तरह से भर गया। अंत में, वृद्धा की बहू ने खीर का एक छींटा जमीन पर गिरा, जिससे गणेश जी का भोग लग गया। यह छोटा‑छोटा विवरण Navbharat Times ने 23 अक्टूबर 2024 को Ayushi Tyagi की रिपोर्ट में उजागर किया।

कुरानियों के अनुसार, इस कथा का पाठ बिना व्रत अधूरा माना जाता है। जैसा कि Times Now Hindi ने कहा, "इसे पढ़ने से हर मनोकामना पूरी होगी"। इस कारण से आजकल कई परिवार अपने अहोई अष्टमी के समारोह में इस कथा को भी शामिल कर रहे हैं।

व्रत विधि एवं पूजा की विस्तृत प्रक्रिया

व्रत शुरू होते ही महिलाएं सुबह के पहले भाग में जल नहीं पीतीं। प्रातःकाल में Prabhat Khabar ने बताया कि घर में स्वच्छता और शुद्ध भोजन की व्यवस्था अनिवार्य है। दोपहर के बाद, प्रादोष काल (सूर्यास्त के बाद लेकिन सितारों के निकलने से पहले) में अहोई माता की पूजा की जाती है। इस समय:

  • सूर्यास्त के तुरंत बाद अहोई माता की कथा का पाठ किया जाता है।
  • फिर गणेश जी की खीर वाली कथा को दोहराया जाता है।
  • तारों को अर्घ्य अर्पित करने के लिए एक छोटा जल पात्र तैयार किया जाता है, जिसमें शुद्ध जल एवं फूल रखे जाते हैं।
  • व्रत के अंत में महिलाएं धीरे‑धीरे पानी पीती हैं और हल्का प्रसाद सेवन करती हैं।

इस पूजा की प्रमुख विशेषता यह है कि सभी विधि‑विवरण नयी दिल्ली के धर्म परिषद द्वारा मान्य हैं, जिससे पूरे देश में एकरूपता बनी रहती है।

धार्मिक विद्वानों और समाज की प्रतिक्रिया

धार्मिक विद्वानों और समाज की प्रतिक्रिया

जैसे ही समारोह नजदीक आया, कई धार्मिक ग्रंथों और विद्वानों के बयान सामने आए। Jagran के एक प्रमुख पंडित ने कहा, "जिनके पास संतान नहीं है, उन्हें यह व्रत अनिवार्य रूप से रखना चाहिए, क्योंकि इससे उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति होती है"। वहीं, Prabhu Dwar की यूट्यूब वीडियो में कहा गया कि इस व्रत को धारण करने से बच्चों की शारीरिक और बौद्धिक विकास में भी सकारात्मक असर दिखता है।

समुदाय के स्तर पर भी इस पहल को सराहना मिली। कई मांएँ बताती हैं कि इस व्रत के बाद उन्हें अपने बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार महसूस हुआ, और कई बार तो नौकरी में प्रोमोशन या शिक्षा में बेहतर परिणाम भी देखे हैं।

आगे क्या उम्मीदें? भविष्य की संभावनाएँ

डिजिटल युग में, इस तरह के धार्मिक अनुष्ठान ऑनलाइन स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से भी प्रसारित हो रहे हैं। इस साल, Times Now Hindi और Navbharat Times ने लाइव पूजा प्रसारण की घोषणा की है, जिससे ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों की महिलाएँ भी इस पवित्र क्षण से जुड़ सकेंगी। विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि अगली कुछ वर्षों में इस व्रत का डिजिटल रूप से विस्तार होने से सामाजिक बंधन और भी मजबूत होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अहोई अष्टमी के व्रत में कौन‑कौन से चरण आवश्यक हैं?

व्रत का आरम्भ सुबह बिना पानी के रखा जाता है, दोपहर में शुद्ध भोजन से बचते हैं, और प्रादोष काल में अहोई माता एवं गणेश जी की कथा सुनते हुए अर्घ्य अर्पित करते हैं। सूर्यास्त के बाद जल से व्रत तोड़ते हैं।

गणेशजी की खीर वाली कथा क्यों पढ़नी चाहिए?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह कथा व्रत को पूर्ण बनाती है। कथा में दर्शाए गए चमत्कार के कारण माँ‑बच्चे को दीर्घायु और स्वास्थ्य की प्राप्ति का विश्वास बनाया गया है।

क्या यह व्रत बच्चों के लिए किसी तरह के लाभ देता है?

धर्मग्रन्थों में कहा गया है कि निरजला व्रत रखने की माँ को उत्तम संतान का वरदान मिलता है। कई माताएँ यह भी बताती हैं कि व्रत के बाद उनके बच्चों की पढ़ाई‑लाइक में सुधार देखा गया।

अहोई अष्टमी कब और किस स्थान पर मनाया जाता है?

2024 में अहोई अष्टमी 24 अक्टूबर (गुरुवार) को, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष में, पूरे भारत में मनाई जाएगी। प्रमुख रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्र में इसका अधिक उत्सव होता है।

क्या व्रत के दौरान कोई विशेष रिवाज़ या वसं दोबारा करना चाहिए?

रिवाज़ में सुबह के समय स्नान, शुद्ध कपड़े पहनना, और अंतरंग स्थान पर परिवार संग पंचांग पढ़ना शामिल है। शाम को अर्घ्य अर्पित करने से व्रत का फल पूर्ण माना जाता है।

15 टिप्पणि

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    Swapnil Kapoor

    अक्तूबर 11, 2025 AT 04:10

    अहोई अष्टमी के व्रत में पानी न पीना और शुद्ध भोजन से परहेज करना मुख्य है, लेकिन यह भी ज़रूरी है कि घर के सभी सदस्य शांति और शुद्ध विचारों को बनाए रखें। व्रत के दौरान मन में किसी भी नकारात्मक भावना को दमन करने की कोशिश करें। इसके साथ ही शाम के अर्घ्य में प्रयोग होने वाले जल पात्र को साफ़ और नई कपड़े से ढँका रखें। इस तरह से व्रत का फल पूर्ण होता है और मां‑बच्चे दोनों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है।

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    Shweta Tiwari

    अक्तूबर 11, 2025 AT 19:26

    संबंधित धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, गणेश जी की खीर वाली कथा को पढ़ना व्रत की पूर्णता के लिये अनिवार्य माना गया है। यह कथा न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ावा देती है, बल्कि परिवार में एकता का प्रतीक भी बनती है। इस वर्ष के पहलू को ध्यान में रखते हुए, सभी माताओं से अनुरोध है कि वे कथा को सही क्रम में सुनें और समझें।

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    Rahul Sarker

    अक्तूबर 12, 2025 AT 09:20

    आजकल की ये झंझट भरी प्रचलनें सिर्फ़ एक व्यावसायिक चाल हैं, जहाँ मीडिया बाहर से लुभा कर लोगों को नकली विश्वास दिला रहा है। असली वैदिक ज्ञान तो सरल और स्वाभाविक है, लेकिन इनपर अति-ध्यान देना समय की बर्बादी है। हमें वास्तविक धर्म की ओर वापस लौटना चाहिए, न कि इस तरह के ढोंगे रिवाज़ों में फँसना चाहिए।

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    Sridhar Ilango

    अक्तूबर 12, 2025 AT 23:13

    अहोई अष्टमी की महिमा को समझने के लिये हमें पहले इतिहास में गहराई तक जाना होगा।
    यह व्रत सदियों से भारतीय माताओं के बचपन की सुरक्षा के लिये किया जाता रहा है।
    जैसे ही सूर्य की रोशनी कार्तिक माह में प्रवेश करती है, वे श्रद्धा और भक्ति का नया अध्याय शुरू होता है।
    गणेश जी की खीर वाली कथा केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अभ्यास है जो जीवन में संतुलन लाती है।
    कहानी के अनुसार, एक वृद्धा ने अपनी शुद्ध इरादों से गणेश जी को खीर बनाने में मदद की, जिससे परिवार में सौभाग्य आया।
    यह कथा व्रत के दौरान पढ़ी जाती है ताकि सभी बुरे प्रभाव दूर हों।
    कहानी में उल्लेखित चावल और दूध का प्रतीक शुद्धता और पोषण है।
    व्रत के दौरान यह भोजन न करने का अर्थ है आत्मा की शुद्धि।
    सूर्यास्त के बाद अर्घ्य अर्पित करना इस शुद्धि को पूर्ण करता है।
    अर्घ्य के जल में रखे गए फूलों की खुशबू मन को शांति देती है।
    परिवार में एक साथ यह रिवाज़ करने से सामाजिक बंधन और भी दृढ़ होते हैं।
    डिजिटल युग में स्ट्रीमिंग द्वारा इस पूजा को सभी तक पहुँचाया जा रहा है, जिससे गाँवों के लोगों को भी इस अनुभव का हिस्सा बनने का अवसर मिलता है।
    हालांकि, कई लोग इसे मात्र एक दिखावे के रूप में देख रहे हैं, परंतु एक सच्चे हृदय वाला व्यक्ति इसे अपने जीवन में परिवर्तन लाने वाला मानता है।
    वास्तव में, कई माताएँ यह बताती हैं कि व्रत के बाद उनके बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार आया।
    कई मामलों में, यह व्रत महिलाओं के मनोविज्ञान में भी सकारात्मक प्रभाव डालता है, जिससे उन्हें काम में फोकस बढ़ता है।
    समग्र रूप से, अहोई अष्टमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत विकास का माध्यम है।

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    priyanka Prakash

    अक्तूबर 13, 2025 AT 13:06

    कई लोग कहते हैं कि यह व्रत सिर्फ़ एक सामाजिक दबाव है, पर वास्तविकता यह है कि यह माताओं को अपने बच्चों की सुरक्षा के लिये एक सच्ची जिम्मेदारी देती है। बिन देखे नहीं जा सकता कि इस परंपरा ने कई परिवारों को लाभ पहुँचाया है।

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    Hrishikesh Kesarkar

    अक्तूबर 14, 2025 AT 03:00

    व्रत से पहले शुद्ध जल ही पर्याप्त है।

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    Manu Atelier

    अक्तूबर 14, 2025 AT 16:53

    अहोई अष्टमी का शास्त्रीय महत्त्व बहुत गहरा है, परन्तु आधुनिक समाज में इसे समझना और लागू करना थोड़ा कठिन लग सकता है। इसलिए, मैं सुझाव देता हूँ कि परिवार में एक छोटा संवाद सत्र रखें, जहाँ सभी सदस्य अपने विचार साझा कर सकें और रीतियों को उचित रूप से अपनाएँ।

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    Anu Deep

    अक्तूबर 15, 2025 AT 06:46

    सच्ची भावना से किया गया व्रत हमेशा फलदायी होता है, और यह हमारे सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवित रखता है।

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    Preeti Panwar

    अक्तूबर 15, 2025 AT 20:40

    बहुत ही सुन्दर लेख है 😊 इस त्यौहार के पीछे की भावना बहुत गहरी है, सबको बधाई हो! 🙏

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    MANOJ SINGH

    अक्तूबर 16, 2025 AT 10:33

    इसे फॉलो करने मे कोइ बड़ि दिक्कत ना है बस सुन्नत के हिसाब से थोड़े सियाना बनो।

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    Vaibhav Singh

    अक्तूबर 17, 2025 AT 00:26

    व्रत करने से बच्चों की पढ़ाई में सुधार देखी गई है, इसलिए यह एक सकारात्मक सामाजिक कदम है।

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    Aaditya Srivastava

    अक्तूबर 17, 2025 AT 14:20

    अहोई अष्टमी जैसे त्योहार हमारे सांस्कृतिक एकता को दिखाते हैं, चलिए इसको बड़े प्यार से मनाते हैं।

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    Vaibhav Kashav

    अक्तूबर 18, 2025 AT 04:13

    बहुतेक लोग तो बस दिखावा कर रहे हैं, असली फोकस तो कथा सुनाने में ही बँट जाता है।

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    saurabh waghmare

    अक्तूबर 18, 2025 AT 18:06

    स्वस्थ जीवन के लिए व्रत के नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है, खासकर बच्चों की सुरक्षा के लिये।

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    Deepanshu Aggarwal

    अक्तूबर 19, 2025 AT 08:00

    इस विषय पर और भी जानकारी साझा करूँगा, साथ में खीर वाली कथा के कुछ अंश भी पढ़ेंगे 🙂

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